बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का सबसे असहज सच यह है कि नतीजे मतगणना से कम और मतदाता सूची की कटौती से ज़्यादा तय हुए। चुनाव से ठीक पहले SIR के नाम पर 47 लाख मतदाताओं को सूची से हटा दिया गया, और जब 202 सीटों का डेटा सामने आया तो पैटर्न चौंकाने वाला था।
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक थे, राजनीतिक गठबंधनों, जातीय पुनर्संरचना और अभियान रणनीतियों के कारण नहीं, बल्कि मतदाता सूची में की गई अभूतपूर्व कटौती के कारण। चुनाव आयोग द्वारा कराए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद बिहार में लगभग 47 लाख मतदाताओं को सूची से हटाया गया। यह संख्या पूरे राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 6% है।
इतनी बड़ी कार्रवाई आमतौर पर किसी राज्य के जनसांख्यिकी में दस–बीस वर्षों में भी नहीं होता। लेकिन बिहार में यह सब कुछ ही महीनों में हुआ और ठीक चुनाव से पहले हुआ। और आज, जब 202 सीटों का विस्तृत डेटा सामने है, तो यह प्रक्रिया सिर्फ सूची-शुद्धीकरण नहीं लगती बल्कि चुनाव-परिणामों को प्रभावित करने वाली एक संगठित घटना प्रतीत होती है।

202 सीटों का निष्कर्ष- जहां SIR समाप्त होता है, वहीं चुनाव परिणाम शुरू होते हैं
केरला कांग्रेस कमिटी के द्वारा साझा किये गए आंकड़ों का विश्लेषण जब डेमोक्रेटिक चरखा ने किया तो 202 सीटों के डेटा में एक बेहद स्पष्ट और असामान्य पैटर्न मिलता है:
202 में से 174 सीटों पर हटाए गए वोट जीत के मार्जिन से ज्यादा थे। और कई सीटों पर यह अंतर 10 से 20 गुना तक है। 75 सीटें ऐसी जहां जीत का अंतर कुछ सौ, और हटाए गए वोट दस-बीस हज़ार।
चुनाव विज्ञान की भाषा में, इसे Electoral Integrity Red Flag कहा जाता है यानी चुनाव की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह। चुनावी परिणाम देखने के बाद सवाल ये है कि कुछ सीटें चुनाव नहीं, SIR द्वारा तय हुईं?
नीचे कुछ सीटें देखें जहां जीत का मार्जिन या हटाए गए वोटर्स का अंतर समझ से परे है:
सर्वाधिक संवेदनशील सीटें
| सीट | जीत का अंतर | हटाए गए वोट | अंतर कितना? |
| संदेश | 27 | 25,062 | 25,035 अधिक |
| अगिआंव (SC) | 95 | 20,316 | 20,221 अधिक |
| बख्तियारपुर | 981 | 17,719 | 16,738 अधिक |
| मोहनिया (SC) | 18752 | 18913 | 161 अधिक |
| बलरामपुर | 389 | 29,254 | 28,865 अधिक |
इन सीटों पर मतदाता सूची से हटाई गई संख्या जीत के अंतर को अनंत गुना पार करती है।यदि इन नामों में से मात्र 1–2% भी वास्तविक मतदाता थे तो इन सीटों का परिणाम पूरी तरह बदल सकता था। क्या यह स्वाभाविक था? क्योंकि हटाए गए वोट असामान्य रूप से ज्यादा हैं।
इतनी बड़ी संख्या में डिलीशन दुर्लभ
भारत के चुनावी इतिहास में किसी राज्य की 50–60 सीटों पर 20,000 से अधिक डिलीशन होना दुर्लभ है।लेकिन बिहार में 100+ सीटें ऐसी हैं जहां डिलीशन की संख्या 20,000 वोट से अधिक है। और कई पर तो 40–60 हज़ार तक।
सबसे अधिक हटाए गए वोट वाली सीटें
- गोपालगंज – 66,270
- कुचायकोट – 59,963
- मोतिहारी – 54,013
- पूर्णिया – 49,427
- बरौली- 46,990
- हथुआ – 45,446
- अमनौर – 37,200
- मसौढ़ी – 36,987
प्रश्न यह नहीं कि नाम हटाए गए। प्रश्न यह है: इतने नाम एक साथ कैसे गायब हो सकते हैं, जबकि राज्य की जनसंख्या स्थिर है? कौन हटाए गए? SIR का भूगोल बताता है कि यह ‘निरपेक्ष सफाई’ नहीं थी
SIR के डिलीशन की अधिकतम मार इन इलाकों पर पड़ी—
- सीमांचल (अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र)
- कोसी और चंपारण (गरीब जिलों में प्रवासी मज़दूर)
- SC-आरक्षित सीटें
- पिछड़े वर्ग बहुल ग्रामीण क्षेत्र
- शहरी गरीब मोहल्ले
- असंगठित मजदूरी वाले परिवार

यही वो क्षेत्र हैं जहां दलित, मुसलमान, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, भूमिहीन किसान, प्रवासी मज़दूर सबसे अधिक संख्या में रहते हैं। यह संयोग नहीं हो सकता। यह पैटर्न संकेत देता है कि SIR का असर समाज के सबसे कमजोर और राजनीतिक रूप से निर्बल समूहों पर पड़ा। NDA को सबसे ज़्यादा लाभ उन्हीं सीटों पर जहां डिलीशन सबसे ज़्यादा थे।
आंकड़े क्या कहते हैं?
जब डेटा को ‘पार्टी-वाइज’ देखा जाता है, तो एक और रोचक तथ्य मिलता है: जहां NDA का मुकाबला कड़ा था, वहां डिलीशन की संख्या सबसे अधिक थी। उदाहरण देखें:
मोतिहारी (BJP जीती)
- मार्जिन: 13,563
- डिलीटेड: 54,013
- प्रभाव अंतर: 40,450
गोपालगंज (BJP जीती)
- मार्जिन: 28,972
- डिलीटेड: 66,270
- प्रभाव अंतर: 37,298
पूर्णिया (BJP जीती)
- मार्जिन: 33,222
- डिलीटेड: 49,427
- प्रभाव अंतर: 16,205
अमनौर (BJP जीती)
- मार्जिन: 3808
- डिलीटेड: 37,200
- प्रभाव अंतर: 33,392
इन सीटों पर यदि हटाए गए वोटर में से केवल 5–7% भी सक्रिय मतदाता रहते, तो जीत का समीकरण पलट जाता। बिहार में यह स्थिति अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य दिखती है। यदि एक राज्य में:
- 47 लाख नाम हटाए जाएं
- 174 सीटों पर यह संख्या मार्जिन से अधिक हो
तो यह स्थिति चुनाव की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठाती है। वोटर सूची सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, यह भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ है। चुनाव आयोग ने अपनी प्रेस ब्रीफिंग में कहा था: “हटाए गए नामों में मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट और गैर-नागरिक शामिल थे।” परंतु आयोग ने कभी सार्वजनिक रूप से यह नहीं बताया:
- मृत पाए गए मतदाताओं की जिला-वार संख्या क्या थी?
- कितने लोग स्थायी रूप से दूसरी जगह बस गए?
- कितने लोग ‘डुप्लीकेट’ थे?
- कितनों को ‘गैर-नागरिक’ माना गया?
और सबसे बड़ा तथ्य:
कोई एफआईआर, कोई गिरफ्तारी, कोई सत्यापन रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं। यदि 47 लाख मनुष्य सूची से बाहर हुए तो किसी जिले में एक भी शिकायत क्यों नहीं दर्ज हुई? यह लोकतंत्र में सिर्फ ‘संदेह’ नहीं, बल्कि पारदर्शिता की अनुपस्थिति दिखाता है।
डेमोक्रेटिक चरखा की SIR के दौरान रिपोर्टिंग में भी ये बात खुलकर सामने आयी थी कि वोटर्स के नाम गलत तरीके से काटे गए हैं। जो ज़िंदा हैं उन्हें मृत बता कर, जो उसी घर में रहते आ रहे हैं उन्हें स्थानांतरित बता कर और कई वोटर्स को नहीं पाए गए बता कर नाम सूची से हटाया गया है।
यानी जिन लोगों के पास पहचान साबित करने के साधन सबसे कम थे उन्हीं के नाम सबसे अधिक हटे। लेकिन बिहार SIR के डेटा में जो दिखता है कि यह सिर्फ प्रशासनिक त्रुटि नहीं, यह लोकतांत्रिक संरचना का संभावित विचलन है।
यह सवाल उठता है: यदि 47 लाख नाम हटे और उनमें से हज़ारों वास्तविक वोटर थे तो क्या यह चुनाव जनता ने तय किया या सूची ने?





