सरकार ने कहा था कि PMCH अब वर्ल्ड क्लास बनेगा और इसका फायदा सीधा बिहार की जनता को मिलेगा लेकिन आज तक ये स्पेशियलिटी ब्लॉक अधूरा है।
पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (PMCH) का सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक बिहार सरकार की उन घोषणाओं का हिस्सा था, जिन्हें देखकर जनता को पहली बार लगा था कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था शायद अब बदलने वाली है। 200 करोड़ रुपये की लागत, 200 बेड की क्षमता, आठ सुपर स्पेशियलिटी विभाग, अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर और नवीनतम मशीनों से लैस एक अस्पताल, यह परियोजना सरकार की प्राथमिकता बताई गई थी। पर आज, 2025 के अंत में, यह अस्पताल एक ऐसे प्रतीक के रूप में खड़ा है, जो यह दर्शाता है कि बिहार में विकास का अर्थ अक्सर केवल भवन निर्माण होता है, न कि सेवाओं का आरंभ।
2019 में इस परियोजना का शिलान्यास बड़ी धूमधाम से किया गया था। प्रेस कॉन्फ्रेंसें हुईं, मॉडल प्लान जारी हुए, और स्वास्थ्य विभाग ने घोषणा की कि यह पूरा प्रोजेक्ट 18 महीनों के भीतर पूरी तरह कार्यरत कर दिया जाएगा। यह वादा कोई छोटी बात नहीं थी क्योंकि पटना और आसपास के जिलों में कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, एंडोक्राइनोलॉजी और अन्य गंभीर बीमारियों के लिए सरकारी स्तर पर कोई भी अत्याधुनिक विकल्प उपलब्ध नहीं था। सरकारी अस्पतालों में भीड़ का यह हाल था कि मरीज स्ट्रेचर की जगह ज़मीन पर इलाज करवाने को मजबूर होते थे।
लेकिन बिहार की प्रशासनिक मशीनरी का सच हमेशा इमारत से शुरू होकर उसी इमारत में खत्म हो जाता है। 18 महीनों में तैयार होने वाली इस परियोजना ने पांच साल में केवल एक ढांचा तैयार किया है जिसमें न मशीनें लगीं, न विशेषज्ञ डॉक्टर आए, और न ही विभाग शुरू हुए।
2019 से 2025 तक क्या हुआ? एक परियोजना की धीमी मौत की कहानी
इस अस्पताल के निर्माण की जिम्मेदारी CPWD को दी गई थी। शुरुआती महीनों में काम ठीक चला, लेकिन जल्द ही प्रोजेक्ट धीमा पड़ने लगा। निर्माण एजेंसी ने कई बार स्वास्थ्य विभाग और सरकार को बताया कि फंड रिलीज़ में देरी हो रही है, तकनीकी अनुमति समय पर नहीं मिल रही, और मशीनों की इंस्टॉलेशन के लिए इमारत तैयार नहीं है।
फिर भी, सरकार ने 70 करोड़ रुपये की मशीनें खरीद लीं क्योंकि खरीद करना आसान था, इंस्टॉलेशन करवाना मुश्किल। मशीनें आईं, कुछ अनपैक भी हुईं, लेकिन इमारत की इलेक्ट्रिकल फिटिंग, गैस पाइपलाइन, OT की हाइब्रिड सेटअप और इंस्टॉलेशन के लिए आवश्यक स्पेस तैयार नहीं होने के कारण उन्हें वापस भेजना पड़ा।
यानी अस्पताल सेवा शुरू होने से पहले ही मशीनें डिस्चार्ज हो गईं।

यह पहली बार नहीं है जब बिहार में उपकरण, डॉक्टर या चिकित्सा सेवाएं भवन पूरा होने से पहले ला दी जाती हैं और फिर वापस लौटाई जाती हैं। लेकिन PMCH जैसी प्रतिष्ठित संस्था में ऐसा होना—बिहार के स्वास्थ्य सिस्टम की असली तस्वीर पेश करता है: योजनाएं कागज़ पर पूरी, लेकिन ज़मीन पर अधूरी।
200 करोड़ खर्च, शून्य सेवा: आखिर ज़िम्मेदार कौन?
प्रश्न यह नहीं है कि काम में देरी क्यों हुई। प्रश्न यह है कि इतने वर्षों में इस देरी के लिए किसी एक अधिकारी, किसी एक विभाग, या किसी एक एजेंसी को ज़िम्मेदार क्यों नहीं ठहराया गया। अगर यह अस्पताल निजी क्षेत्र में बन रहा होता, तो दो महीने की देरी भी कंपनी के लिए आर्थिक दंड बन जाती। लेकिन सरकारी अस्पतालों में देरी का कोई कीमत नहीं होती उसकी कीमत मरीज़ चुकाते हैं, जिनकी जान इलाज के इंतज़ार में चली जाती है।
सुपर स्पेशियलिटी विभाग—अब भी कागज़ पर बंद
यह अस्पताल जिन आठ विभागों के नाम पर बनाया गया था, उनमें से एक भी आज तक चालू नहीं हुआ। ये विभाग कार्डियो, न्यूरो, एंडोक्राइन, गैस्ट्रो और पल्मोनरी जैसे गंभीर क्षेत्रों में अत्याधुनिक इलाज प्रदान करने वाले बताए गए थे।
अगर ये विभाग चालू हो जाते, तो पटना और आसपास के जिलों के लाखों मरीजों को निजी अस्पतालों के महंगे इलाज से राहत मिलती। AIIMS पटना में छह महीने से एक साल तक की लंबी वेटिंग लिस्ट कम होती। जिलों से रेफर होकर आने वाले गंभीर मरीजों को तुरंत इलाज मिलता। और सबसे अहम गरीब मरीजों को कर्ज़ लेकर इलाज नहीं करवाना पड़ता।
लेकिन इन विभागों के नाम पर आज भी सिर्फ़ एक इमारत खड़ी है जहां यदि कोई मरीज गलती से भी पहुंच जाए, तो उसे कहा जाएगा:
“अभी अस्पताल चालू नहीं हुआ है।”

PMCH की यह देरी सिर्फ़ देरी नहीं, स्वास्थ्य असमानता की जड़ है
पटना जैसे शहर में भी सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं चरमराई हुई हैं। AIIMS और IGIMS दोनों पहले से ही भर चुके हैं। ऐसे में PMCH सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक का समय पर शुरू न होना सीधे जनता को निजी अस्पतालों के बूते पर छोड़ देता है। ऐसे अस्पतालों में जहां ICU का एक दिन 10–20 हजार का खर्च हो सकता है, सर्जरी 2–5 लाख रुपये की हो सकती है, और दवाइयों का बिल मरीज की पूरी जमा-पूंजी छीन लेता है।
PMCH में एक सुपर स्पेशियलिटी विभाग का शुरू होना एक गरीब मरीज के लिए सिर्फ़ स्वास्थ्य सुविधा नहीं, बल्कि एक जीवन रेखा है। लेकिन यह जीवन रेखा पिछले पाँच साल से फाइलों में दम तोड़ रही है।
मरीजों की आवाज़ जो हर बार सरकार को आईना दिखाती है
हमने जब अस्पताल के बाहर मरीजों से बात की, तो कई कहानियां एक जैसी लगीं। एक मजदूर ने बताया कि उसका 14 साल का बेटा दिल की बीमारी से जूझ रहा है और निजी अस्पताल ने इलाज का अनुमान 3 लाख रुपये बताया। उसने कहा, “पास के प्राइवेट अस्पताल में इतना पैसा कह रहा है कि हमको समझ में नहीं आ रहा क्या करें। सरकार बोली थी कि नया पीएमसीएच में सब सुविधा होगी लेकिन वो तो अभी तक खुला भी नहीं है।”
ऐसे हजारों लोग हैं जिनकी जिंदगी इस अधूरे प्रोजेक्ट से सीधे प्रभावित हो रही है, और यह सिर्फ़ एक अस्पताल की कहानी नहीं यह पूरे बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की कहानी है।
बिहार के अस्पतालों की यही पहचान है—अधूरा काम, आधा सच
यह PMCH का पहला मामला नहीं है। भागलपुर सुपर स्पेशियलिटी सेंटर तीन साल लेट हुआ। दरभंगा में AIIMS प्रोजेक्ट आधे रास्ते में अटक गया। जिला अस्पतालों में CT स्कैन मशीनें महीनों तक बंद रहती हैं। कई प्राथमिक केंद्रों में डॉक्टर ही मौजूद नहीं है। और कई मेडिकल कॉलेजों में 40–50% पद खाली हैं।
पीएमसीएच के सुपर स्पेशियलिटी सेंटर की देरी इन सभी विफलताओं का संयुक्त प्रतीक बन चुकी है।





