बिहार विश्वविद्यालय में शिक्षक नियुक्ति की प्रक्रिया सालों से अटकी हुई है। इसे लेकर सरकार के रवैये पर प्रश्नचिन्ह बना हुआ है।
बिहार की विश्वविद्यालय शिक्षक नियुक्ति प्रणाली पिछले पांच वर्षों में जिस गुत्थी में उलझी है, उसे देखकर लगता है कि यहां शिक्षा के नाम पर घोषणाएं तो बहुत होती हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर सब कुछ किसी पुराने, जाम हुए मशीन की तरह अटका रहता है। 2020 में बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) ने जब 52 विषयों में असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती का बड़ा विज्ञापन निकाला था, तो शिक्षण जगत में उम्मीद की लहर दौड़ गई थी।
लगा था कि अब कई वर्षों से खाली पड़े विभागों में नई जान आएगी और विश्वविद्यालयों में अध्यापन की गुणवत्ता सुधरेगी। लेकिन 2025 आते-आते सच्चाई बिल्कुल उलट गयी है। 52 विषयों में से 48 विषयों में नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ गई, लेकिन चार विषय- इतिहास, कॉमर्स, बॉटनी और जूलॉजी आज भी कोर्ट, रोस्टर और प्रशासनिक देरी के दलदल में फंसे हुए हैं।
इन चार विषयों का रुक जाना सिर्फ संख्या का मामला नहीं है, बल्कि बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था की गहराई में मौजूद उस बीमारी की पहचान है, जो हर भर्ती, हर प्रक्रिया और हर संस्थान में बार-बार सिर उठाती है। दैनिक भास्कर की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार इन चार विषयों में कुल मिलाकर सैकड़ों पद खाली हैं। इतिहास में 316, बॉटनी में 333, जूलॉजी में 285 और कॉमर्स में 112 रिक्तियां हैं। यानी चार विषयों में 1,000 से अधिक पद खाली पड़े हैं, जबकि विश्वविद्यालयों में छात्र रोज़ाना कक्षाएं ढूंढते भटक रहे हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि बिहार में भवन तो बन रहे हैं, विभाग खुल रहे हैं, पर शिक्षक गायब हैं।
विश्वविद्यालय शिक्षक नियुक्ति की शुरुआत मुकदमे से
इस कहानी की शुरुआत अदालत से होती है। कई अभ्यर्थियों ने BSUSC की प्रक्रिया को पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। आरोप यह था कि आयोग ने रोस्टर तैयार करने में भारी गड़बड़ी की है, विषयवार आरक्षण का हिसाब साफ़ नहीं है और कुछ विषयों में कट-ऑफ, एलिजिबिल्टी और विज्ञापन शर्तें अस्पष्ट हैं। अदालत ने केस की सुनवाई शुरू की और फैसला आने तक आयोग को निर्देश दिया कि इन चार विषयों का इंटरव्यू न लिया जाए। इतिहास और कॉमर्स में सुनवाई पूरी भी हो चुकी है, लेकिन बॉटनी और जूलॉजी में मामला अभी भी लंबित है। इसका मतलब यह है कि जब तक कोर्ट अंतिम आदेश नहीं दे देता, इन विषयों की बहाली पर आगे कदम बढ़ाना संभव ही नहीं है।
लेकिन यह सवाल उठाना ज़रूरी है कि क्या सारी गलती सिर्फ कोर्ट में फंसे केस की है? जवाब है- बिल्कुल नहीं। असल समस्या आरक्षण रोस्टर और बैकलॉग व्यवस्था में गड़बड़ी की है। फरवरी 2023 में हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग को रोस्टर पुनर्समीक्षा का आदेश दिया था। विभाग ने संशोधित रोस्टर भेजा भी, लेकिन उसमें भी त्रुटियों की भरमार थी। बैकलॉग सीटों की स्थिति साफ़ नहीं थी, विषयवार विभाजन में अन्तर था और कुछ श्रेणियों में सीटों की गणना ही मेल नहीं खाती थी। जब सूची ही गलत हो, तो नियुक्ति कैसे पारदर्शी हो सकती है? इसी अस्पष्टता ने पूरी प्रक्रिया को अविश्वसनीय बना दिया।
इस बीच विश्वविद्यालयों का हाल खराब होता गया। इन चार विषयों के अधिकांश कॉलेजों में आज भी पढ़ाई सिर्फ गेस्ट फैकल्टी पर चल रही है। इतिहास विभाग में महीनों तक कक्षाएं नहीं होतीं, बॉटनी और जूलॉजी में प्रैक्टिकल करने के लिए छात्र या तो खुद प्रयोग करते हैं या इंटरनेट पर वीडियो देखकर कॉपी में लिख देते हैं, और कॉमर्स विभाग में एक स्थायी शिक्षक पर इतने सेक्शन का भार है कि शेड्यूल बनाना ही असंभव है। सीखने की प्रक्रिया कागज़ों पर मौजूद है, लेकिन कक्षाओं में नहीं।
घोषणा के 5 साल बाद भी सिर्फ़ निराशा
इस बहाली की घोषणा 2020 में हुई थी और दावा किया गया था कि 2023 तक सभी पद भर दिये जाएंगे। लेकिन पांच साल बाद स्थिति यह है कि प्रक्रिया आधी रुकी हुई है। स्पष्ट है कि यह देरी सिर्फ कोर्ट केस के कारण नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम की सुस्ती का नतीजा है। बिहार में नौकरियां घोषित करना आसान है, उन्हें पूरा करना असंभव जैसा। यही वजह है कि 2020 में निकला विज्ञापन आज 2025 में भी अधूरा पड़ा है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस कहानी में सबसे बड़ी कीमत छात्र चुका रहे हैं। उन्हें समय पर कक्षाएं नहीं मिल रहीं, परीक्षा की तैयारी असंगठित है, और प्रैक्टिकल विषयों में सीखने की प्रक्रिया लगभग ठप हो चुकी है। कई छात्रों ने अपनी पढ़ाई का सफर निजी कोचिंग और यूट्यूब वीडियो पर आधारित बना लिया है। विश्वविद्यालय उनके लिए सिर्फ एक औपचारिक स्टेशन बनकर रह गया है, जहां वे सेमेस्टर फॉर्म भरते हैं और परीक्षा देने जाते हैं। राज्य की उच्च शिक्षा जिस नींव पर खड़ी होती है, वह नींव, यानी शिक्षक ही लगभग गायब है।
आयोग का दावा है कि दिसंबर 2025 तक सभी विषयों में बहाली पूरी कर दी जाएगी। लेकिन इस दावे पर विश्वास करना मुश्किल है, क्योंकि यह व्यवस्था हर चरण में देरी और अस्पष्टता से भरी हुई है। बिहार की सरकारी भर्तियों का एक इतिहास है, विज्ञापन में भव्यता, प्रक्रिया में सुस्ती, और परिणाम में अनिश्चितता।
इस पूरी कहानी का सार यह है कि बिहार की शिक्षा प्रणाली महज इमारतों, विभागों और फाइलों का ढांचा बनकर रह गई है। विश्वविद्यालयों की हालत देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि शिक्षण संस्थान अब छात्रों को शिक्षा के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ दाख़िले और परीक्षा के लिए मौजूद हैं। विश्वविद्यालय शिक्षक नियुक्ति हुई नहीं हैं, इंटरव्यू रुके हुए हैं, रोस्टर गलत है, और अदालतों में केस अटका है — इस सबके बीच छात्र सबसे ज्यादा परेशान हैं, लेकिन उनकी आवाज़ कहीं नहीं सुनी जा रही।
चार विषयों की बहाली सिर्फ एक प्रशासनिक फाइल का मुद्दा नहीं है। यह बिहार की उच्च शिक्षा की जड़ में छिपी टूट-फूट का आईना है। जब तक सिस्टम पारदर्शी नहीं होगा, रोस्टर स्पष्ट नहीं होगा, और नियुक्तियां ईमानदारी से नहीं होंगी तब तक किसी भी यूनिवर्सिटी में शिक्षण की गुणवत्ता सुधरना मुश्किल है।





