अगर पीएमसीएच की लैब में मशीनें नहीं चल रहीं, रिपोर्ट समय पर नहीं मिल रहीं, और मरीजों को निजी लैब का सहारा लेना पड़ रहा है, तो इस विस्तार का अर्थ क्या रह जाता है?
पटना के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की गलियों में सुबह जल्दी भीड़ लग जाती है। रजिस्ट्रेशन काउंटर के बाहर कतार, खून जांच के लिए अलग लाइन, और रिपोर्ट लेने वालों की अलग बेचैनी। कोई प्लेटलेट्स के नंबर पूछ रहा है, कोई शुगर की रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहा है, तो कोई लिवर फंक्शन टेस्ट के परिणाम के बिना दवा शुरू नहीं कर पा रहा। इस अफरातफरी के बीच एक सच्चाई खामोशी से खड़ी है—दस साल पहले खरीदी गई कई ऑटो एनालाइज़र मशीनें आज भी डिब्बों में बंद हैं। पीएमसीएच की लैब का संकट अब भी बना हुआ है।

सरकार का दावा है कि पीएमसीएच का कायाकल्प हो रहा है। 5462 बेड की क्षमता वाला नया परिसर, आधुनिक सुविधाएं, अत्याधुनिक ब्लॉक। लेकिन सवाल यह है कि क्या ईंट और सीमेंट से स्वास्थ्य बनता है? अगर लैब में मशीनें नहीं चल रहीं, रिपोर्ट समय पर नहीं मिल रहीं, और मरीजों को निजी लैब का सहारा लेना पड़ रहा है, तो इस विस्तार का अर्थ क्या रह जाता है?
मशीनें खरीदी गईं, लेकिन चली नहीं
साल 2011 से 2014 के बीच करोड़ों रुपये खर्च कर ऑटो एनालाइज़र मशीनें खरीदी गई थीं। मकसद साफ था—एक घंटे में सैकड़ों सैंपल की जांच, तेज और सटीक रिपोर्ट, और भीड़भाड़ वाले सरकारी अस्पताल में राहत। लेकिन एक दशक बाद भी कई मशीनें डिब्बों में बंद पड़ी हैं। कुछ तो अब तकनीकी रूप से पुरानी भी हो चुकी हैं।

ऑटो एनालाइज़र मशीन कोई साधारण उपकरण नहीं होती। यह ब्लड सैंपल का स्वतः विश्लेषण करती है—प्लेटलेट्स, शुगर, लिवर फंक्शन, किडनी प्रोफाइल, सब कुछ। जहां मानव त्रुटि की संभावना होती है, वहां मशीन सटीकता देती है। लेकिन मशीनें तभी काम करती हैं जब उन्हें स्थापित किया जाए, कैलिब्रेट किया जाए, और प्रशिक्षित तकनीशियन उपलब्ध हों। यहीं पर व्यवस्था की दरार दिखती है।
रिपोर्ट में गड़बड़ी, इलाज पर असर
पीएमसीएच में ऐसे मामले सामने आए हैं जहां लैब रिपोर्ट और निजी लैब की रिपोर्ट में भारी अंतर पाया गया। प्लेटलेट्स की गिनती 60 हजार बताई गई, जबकि बाहरी जांच में 1.3 लाख निकली। ब्लड शुगर 250 बताई गई, जबकि वास्तविक स्तर 110 था। लिवर फंक्शन टेस्ट में बिलिरुबिन 12.5 दर्शाया गया, जबकि दूसरी रिपोर्ट में 4.2 था।
ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। ये इलाज की दिशा तय करते हैं। एक गलत रिपोर्ट मरीज को आईसीयू तक पहुंचा सकती है। गलत शुगर रिपोर्ट से अनावश्यक दवा शुरू हो सकती है। और जब रिपोर्ट पर भरोसा टूटता है, तो पूरा तंत्र सवालों में घिर जाता है।
तकनीशियन की कमी: असली बाधा
तीस साल पहले पीएमसीएच में 21 लैब तकनीशियन थे, जब बेड की संख्या 1750 थी। आज बेड की संख्या बढ़ी है, मरीजों की संख्या कई गुना हुई है, लेकिन तकनीशियन लगभग उतने ही हैं—और उनमें से भी कई पद खाली हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इतने बड़े अस्पताल के लिए कम से कम 90 तकनीशियन की जरूरत है।
मशीन खरीद लेना आसान है, उसे चलाना मुश्किल। क्योंकि मशीन के साथ मानव संसाधन भी चाहिए—प्रशिक्षण, मेंटेनेंस, नियमित कैलिब्रेशन। अगर यह नहीं है, तो करोड़ों की मशीनें सिर्फ शोपीस बन जाती हैं।
जांच सप्ताह में तीन दिन?
रिपोर्ट के अनुसार, पैथोलॉजी विभाग में कुछ जांच सप्ताह में सिर्फ तीन दिन ही हो रही हैं। सोमवार, बुधवार और शुक्रवार। ऐसे में गंभीर मरीजों को या तो इंतजार करना पड़ता है या निजी लैब का रुख करना पड़ता है। गरीब मरीज के लिए यह दोहरी मार है—सरकारी अस्पताल में लाइन और बाहर खर्च।

पीएमसीएच का पुनर्निर्माण हो रहा है। नया भवन बन रहा है। लेकिन अगर बुनियादी सेवाएं—जैसे सटीक और समय पर जांच—सुधर नहीं रहीं, तो यह विस्तार अधूरा है। स्वास्थ्य सेवा का अर्थ सिर्फ इमारत नहीं, प्रक्रिया है। सिर्फ बेड नहीं, भरोसा है।
सरकार कहती है कि मशीनों से तेज जांच होगी। लेकिन जमीन पर मशीनें डिब्बों में बंद हैं। सरकार कहती है कि नई सुविधाएं आएंगी। लेकिन मरीज आज भी रिपोर्ट के लिए भटक रहा है। यह वही दूरी है जो अक्सर नीति और जमीन के बीच होती है।
क्या समाधान है?
पहला—मानव संसाधन की भर्ती।
दूसरा—मशीनों की तत्काल स्थापना और ऑडिट।
तीसरा—रिपोर्ट की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच।
चौथा—रिपोर्टिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता।
अगर यह नहीं हुआ, तो नया पीएमसीएच भी पुराने संकट को ढोता रहेगा।
आख़िरी सवाल
जब मरीज खून देता है, तो वह सिर्फ सैंपल नहीं देता—वह भरोसा देता है। अगर रिपोर्ट गलत है, तो भरोसा टूटता है। और जब भरोसा टूटता है, तो सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव हिलती है। पीएमसीएच की लैब का संकट सिर्फ मशीनों का नहीं है। यह उस सोच का संकट है जिसमें खरीद को सुधार समझ लिया जाता है, और संचालन को भुला दिया जाता है।
मशीनें डिब्बों में बंद हैं। लेकिन सवाल खुले हैं।





