कई मृतकों का नाम SIR सूची में मौजूद, क्या ये एक फर्जीवाड़ा है?

चुनाव आयोग ने बिहार में 2025 में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की शुरुआत की ताकि वोटर लिस्ट को अपडेट किया जा सके, ग़लत नाम हटाए जा सकें और नए मतदाता जोड़े जा सकें। लेकिन जमीनी सर्वे बताते हैं कि यह प्रक्रिया सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गई है।

“हम जिंदा हैं, फिर भी पहचानने को कोई तैयार नहीं। और जो नहीं रहे, उनका नाम अब भी सरकारी लिस्ट में है।”

बिहार के कई मोहल्लों और बस्तियों में जब Democratic Charkha और Samar Youths की टीम ने जाकर लोगों से बातचीत की, तो हर कोने से यही आह निकल रही थी। एक ऐसा गुस्सा, जो अब थक चुका है — दस्तावेज़ों की मारामारी, सिस्टम की लापरवाही, और लोकतंत्र से धीरे-धीरे बाहर किए जाते लोग।

सर्वे की तस्वीर: आंकड़े जो अंदर तक हिला देते हैं

सर्वे कुल 268 लोगों पर आधारित था। लेकिन इनकी कोशिशों का सामना जिस सिस्टम से हुआ, उसने केवल तकलीफ़ें ही दीं।

मुख्य आंकड़े:

  • 47 लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपने दस्तावेज़ पहले ही BLO को जमा कर दिए थे। फिर भी उनसे दोबारा वही दस्तावेज़ मांगे जा रहे हैं।
  • 21 लोग ऐसे हैं जिनका EPIC नंबर (मतदाता पहचान संख्या) गलत बता रहा है। अगर इसका समाधान नहीं होता है तो वो आगामी चुनाव में भाग नहीं ले पाएंगे।
  • 8 लोग ऐसे हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है, फिर भी उनका नाम अभी भी SIR लिस्ट में बना हुआ है।

इन आंकड़ों का मतलब सिर्फ़ नंबर नहीं है। ये असल में सिस्टम की विफलता का खुलासा करते हैं, जो न केवल कागज़ों में है बल्कि लोगों की ज़िंदगी और लोकतांत्रिक अधिकारों पर भी सीधा असर डाल रहा है।

“हमने कागज़ जमा किया, लेकिन जवाब नहीं आया…”

पटना के सबरी नगर में रहने वाली शारदा देवी (बदला हुआ नाम) ने बताया:

“पिछले महीने फॉर्म भरा था, BLO ने आधार कार्ड, राशन कार्ड और बिजली बिल मांगा था, वो सब लगाया। अब फिर कह रहे हैं – फिर से जमा कीजिए। काहे?”

शारदा की आवाज़ में थकावट है, लेकिन उसकी आंखों में सिस्टम के खिलाफ़ सवाल हैं। यह सिर्फ़ एक महिला की कहानी नहीं, बल्कि उन 47 लोगों की कहानी है, और फिर भी उन्हें फिर से दस्तावेज़ जमा करने के लिए कहा जा रहा है।

EPIC नंबर नहीं तो वोट कैसे?

EPIC नंबर यानी Electors Photo Identity Card। एक ऐसा कार्ड, जो किसी भारतीय को मतदाता के रूप में पहचान देता है। लेकिन हमारे सर्वे में 21 ऐसे लोग मिले, जिनका एपिक नंबर गलत बता रहा है।

इसका मतलब? वे अगले चुनाव में वोट नहीं डाल सकते। यानी उनका लोकतांत्रिक अधिकार उनसे छीन लिया गया है — बिना किसी अपराध के, सिर्फ़ सरकारी उदासीनता के कारण।

मृतकों के नाम लिस्ट में – क्या ये फर्ज़ीवाड़े का संकेत है?

और सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा – 8 लोग, जिनकी मृत्यु हो चुकी है, उनका नाम अब भी SIR लिस्ट में बना हुआ है। यानी प्रशासन के रिकॉर्ड में वे अब भी ‘जिंदा मतदाता’ हैं।

“मेरे दादा का देहांत दो साल पहले हुआ। फिर भी पिछले महीने उनके नाम से वोटर कार्ड घर आया।”

यह बयान एक स्थानीय निवासी ने दिया। इसका मतलब है कि या तो सिस्टम मृतकों की जानकारी अपडेट नहीं कर पा रहा है या फिर किसी जानबूझ कर की गई फर्ज़ीवाड़े की तैयारी है।

ऐसी स्थिति में अगर कोई दूसरा व्यक्ति उस मृत व्यक्ति के नाम पर वोट डाल दे, तो क्या चुनाव निष्पक्ष रह जाएगा?

यह सब क्यों हो रहा है?

इस पूरे सिस्टम में कई खामियां हैं:

1. डिजिटल प्रक्रिया का अभाव:

आज भी अधिकांश क्षेत्रों में आवेदन ऑफलाइन होते हैं। कागज़ गुम हो जाना, अपलोड न होना, अधिकारी का ध्यान न देना – ये आम समस्याएं हैं।

2. मानव संसाधन की कमी:

वोटर लिस्ट अपडेट करने वाले कर्मचारियों की संख्या और ट्रेनिंग पर्याप्त नहीं है। इससे गलतियां आम हो जाती हैं।

3. लापरवाही और जवाबदेही की कमी:

जब लोग शिकायत करते हैं, तो सुनवाई नहीं होती। अधिकारियों से जवाब मांगो, तो या तो फ़ाइल गुम हो जाती है, या जवाब गोलमोल होता है।

क्या यह जानबूझ कर किया जा रहा है?

जब आंकड़े बताते हैं कि ज़िंदा लोग लाइन में हैं और मृतकों के नाम सूची में, तो सवाल उठता है कि यह सिर्फ़ लापरवाही है या फिर इसके पीछे कोई राजनीतिक मंशा है?

क्या किसी खास समुदाय, जाति या वर्ग को वोट देने से वंचित करने की साज़िश तो नहीं?

अगर वोटर लिस्ट में गड़बड़ी जानबूझ कर की जा रही है, तो यह सीधे-सीधे लोकतंत्र की हत्या है। और अगर यह सिर्फ़ अनदेखी है, तब भी यह बेहद गंभीर मामला है।

इसका असर कितना गहरा है?

बिहार जैसे राज्य, जहां समाज के हाशिए पर खड़े लोग पहले से ही बेरोज़गारी, भुखमरी और ग़रीबी से जूझ रहे हैं — अगर वहां पहचान और वोट जैसे मूल अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाए, तो यह बहिष्कार से कम नहीं।

समाधान क्या है?

यह समस्या सिर्फ़ एक रिपोर्ट या सर्वे से हल नहीं होगी। इसके लिए ठोस और व्यवस्थित सुधार जरूरी हैं:

  1. डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम: जहां हर आवेदन की स्थिति ऑनलाइन देखी जा सके।
  2. ऑटोमैटिक डेड पीपल डिटेक्शन: मृतकों के प्रमाणपत्र के आधार पर नाम हटाना अनिवार्य हो।
  3. सुनवाई की गारंटी: एक हेल्पलाइन या लोकल कैंप जहां लोग अपनी शिकायत दर्ज कर सकें और जवाब पा सकें।
  4. सीवीएलओ (Chief Electoral Officer) स्तर पर निगरानी: ताकि हर जिले की कार्यप्रणाली की जवाबदेही तय हो।

वोट देना अधिकार है, एहसान नहीं। लेकिन जब नागरिक अपने ही देश में बार-बार दस्तावेज़ों से अपनी नागरिकता साबित करने पर मजबूर हो जाएं, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र सिर्फ़ नाम का रह गया है।

Democratic Charkha और Samar Youths की यह साझी पहल इस सच को सामने लाने का छोटा सा प्रयास है। पर सवाल यह है — क्या इस पर कोई कार्यवाही होगी? या यह सिर्फ़ एक और रिपोर्ट बनकर दफ्तर की फाइलों में गुम हो जाएगी?

अगर आपके इलाके में भी ऐसी समस्याएं हैं, तो हमें democraticcharkha@gmail.com पर लिखें। हम आपकी आवाज़ को आगे पहुंचाएंगे।