विकलांग पेंशन 400 रुपये का वादा: और बिहार में दिव्यांगों की टूटती उम्मीद

बिहार विकलांग पेंशन योजना के तहत 40% या उससे अधिक विकलांगता वाले व्यक्तियों को ₹400 प्रति माह की पेंशन दी जाती है. यह राशि सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में भेजी जाती है.

भारत में हर नागरिक को समान अधिकार दिए गए हैं, लेकिन क्या यह हकीकत में लागू हो पाता है? जब बात समाज के सबसे कमजोर वर्गों की आती है, तो अक्सर नीतियां कागजों पर ही सिमट कर रह जाती हैं. बिहार में दिव्यांग नागरिकों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है. सरकार द्वारा चलाई जा रही बिहार विकलांग पेंशन योजना दिव्यांगों के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन क्या यह उनकी वास्तविक जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है? बिहार में दिव्यांगों की संख्या लाखों में है, लेकिन उन्हें मिलने वाली सरकारी सहायता न केवल अपर्याप्त है, बल्कि इसकी पहुंच भी सीमित है.

बिहार विकलांग पेंशन योजना: कितनी कारगर?

बिहार सरकार ने राज्य के दिव्यांग नागरिकों के लिए बिहार विकलांग पेंशन योजना शुरू की थी, ताकि उन्हें हर महीने आर्थिक सहायता मिल सके. इस योजना के तहत 40% या उससे अधिक विकलांगता वाले व्यक्तियों को ₹400 प्रति माह की पेंशन दी जाती है. यह राशि सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में भेजी जाती है, और आवेदन की प्रक्रिया ऑफलाइन होती है, जिसके लिए आवेदकों को समाज कल्याण विभाग में आवेदन जमा करना पड़ता है.

लेकिन सवाल उठता है कि क्या ₹400 प्रति माह आज के समय में किसी भी व्यक्ति की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है? पटना के रहने वाले आदित्य जो की विकलांग हैं. जब हमने उनसे बात की तो उन्होंने बताया कि400 रुपए, क्या ये 400 रुपए जीवन बिताने के लिए काफ़ी है? ऐसा लगता है की सरकार यह पैसे देकर बेइज्जत कर रही है. महंगाई बढ़ती जा रही है, नौकरी कम होते जा रही है, ऐसे में महीने के 400 रुपए से जीवन गुज़ारना मुश्किल है.”

अन्य राज्यों की तुलना में बिहार क्यों पिछड़ा?

जब हम बिहार की इस योजना की तुलना अन्य राज्यों से करते हैं, तो यह साफ दिखता है कि बिहार के दिव्यांगों को बहुत कम आर्थिक सहायता मिल रही है.

उत्तर प्रदेश में विकलांग पेंशन योजना के तहत ₹1000 प्रति माह दिए जाते हैं, दिल्ली सरकार अपने दिव्यांग नागरिकों को ₹2500 प्रति माह प्रदान करती है, तमिलनाडु में यह राशि ₹2000 प्रति माह है. जब अन्य राज्यों में दिव्यांगों को अधिक सहायता दी जा रही है, तो बिहार में यह राशि केवल ₹400 ही क्यों है? यह सवाल लंबे समय से उठाया जा रहा है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस जवाब या कार्रवाई नहीं हुई है.

दिव्यांगों की अधूरी मांगें और उनकी जटिलताएं

बिहार में दिव्यांग समुदाय वर्षों से अपनी पेंशन बढ़ाने की मांग कर रहा है . उनकी यह मांग बेहद जायज भी है, क्योंकि ₹400 में कोई भी व्यक्ति अपनी बुनियादी जरूरतें कैसे पूरी कर सकता है. दिव्यांग संगठनों ने सरकार से यह राशि कम से कम ₹3000 प्रति माह करने की मांग की है, लेकिन अब तक इस पर कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया है.

दिव्यांग व्यक्तियों को लेकर कई योजनायें, धरातल पर सब हवाहवाई

इसके अलावा, विकलांग प्रमाण पत्र बनवाने की प्रक्रिया भी बेहद जटिल है. खासकर मूक-बधिर और मानसिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए प्रमाण पत्र बनवाना बहुत मुश्किल है. गरीब परिवारों के लिए यह एक बहुत बड़ी समस्या है, क्योंकि प्रमाण पत्र के बिना वे किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं उठा सकते. दिव्यांग संगठनों ने मांग की है कि विशेष जांच शिविर आयोजित कर विकलांग प्रमाण पत्र जारी किए जाएं, ताकि अधिक से अधिक जरूरतमंद लोग इस योजना का लाभ उठा सकें. पटना के रहने वाली पुष्पा कुमारी बताती हैं कि “ मुझे विकलांग पेंशन का लाभ नहीं मिलता है. मैंने कई बार कोशिश की है लेकिन हमेशा लिस्ट में मेरा नाम नहीं आता है. मुझे पता है की इसमें क्या क्या दस्तावेज़ देना है और सारे दस्तावेज़ है मेरे पास पर फिर भी मुझे इस योजना का लाभ नहीं मिलता है.”

बिहार में दिव्यांगों की स्थिति: आंकड़े क्या कहते हैं?

2011 की जनगणना के अनुसार, बिहार में 23,31,009 दिव्यांग नागरिक हैं. हालांकि, यह आंकड़ा अब पुराना हो चुका है, और वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है. आंकड़ों के अनुसार: बिहार विकलांगों की संख्या के मामले में देश में तीसरे स्थान पर है, बिहार में विकलांगों की कुल 8.69% आबादी है, जिसमें 8.98% पुरुष और 8.13% महिलाएंशामिल हैं, 10.98% दिव्यांग जन ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, जबकि 3.48% शहरी क्षेत्रों में. यह स्पष्ट है कि दिव्यांगों की सबसे ज़्यादा आबादी गांवों में रहती है, जहां बुनियादी सुविधाओं की पहले से ही भारी कमी है. ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वह दिव्यांगों के लिए अधिक सहायक योजनाएं लेकर आए.

सुगम्य भारत अभियान’ और दिव्यांग अधिकार कानून: कितना प्रभावी?

3 दिसंबर 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिव्यांगजनों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर ‘सुगम्य भारत अभियान’की शुरुआत की थी. इसका उद्देश्य था कि सरकारी कार्यालयों, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, बस स्टैंड, हॉस्पिटल, पार्क, शॉपिंग मॉल, सिनेमाघर, धार्मिक स्थलों को दिव्यांगों के लिए सुलभ बनाया जाए, इसके अलावा, RPWD (Rights of Persons with Disabilities) एक्ट 2016 के तहत दिव्यांगों को शिक्षा और रोजगार में समान अवसर प्रदान करने की पहल की गई.

सरकारी नौकरियों में दिव्यांगों के लिए आरक्षण 3% से बढ़ाकर 4% किया गया, शिक्षण संस्थानों में दिव्यांगों के लिए 5% आरक्षण दिया गया. लेकिन बिहार में इन कानूनों और योजनाओं का सही ढंग से कार्यान्वयन नहीं हो पा रहा है. आज भी हजारों दिव्यांगों को सरकारी इमारतों, अस्पतालों और स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव झेलना पड़ता है.

दिव्यांग आरक्षण नियम

पटना जंक्शन पर बड़ी मुशक्कतों बाद दिव्यांगजनों के लिए विशेष शौचालय बनाया गया. लेकिन बाकी शौचालय के तरह जंक्शन का भी शौचालय में ताला लगा हुआ है. इस पर वैष्णवी बताती हैं कि “एक बार मैं स्टेशन गई. वहां शौचालय में ताला लगा था और चाभी स्टेशन मास्टर के पास थी. अब इमरजेंसी में इंसान चाभी लाने जाएगा? दिव्यांगों के लिए बिहार में शौचालय की भरी कमी है. जहां है भी तो वहां ताला बंद है और ये ताला इसलिए बंद होता है क्योंकि अंदर कचड़ा रहता है. अगर हम लोग पूरे दिन के लिए बाहर निकलते हैं तो मजबूरी में घर भागना पड़ता है. क्योंकि सुलभ शौचालय हमारे योग्य नहीं है. कहीं भी दिव्यांगों के लिए शौचालय नहीं है. ना ही ज़ू ना ही किसी सिनेमा घर में.”

यूडीआईडी कार्ड: दिव्यांगों के लिए नई चुनौती

सरकार ने हाल ही में एक आदेश जारी किया है कि अब पुराने दिव्यांग प्रमाण पत्र की जगह केवल यूडीआईडी (Unique Disability ID) कार्ड मान्य होगा. यह कार्ड दिव्यांगों की पहचान और सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच को आसान बनाने के लिए लाया गया था. लेकिन समस्या यह है कि बिहार में 95% दिव्यांगों के पास यह कार्ड ही नहीं है.

अगर पुराने प्रमाण पत्र को अमान्य कर दिया जाता है, तो हजारों दिव्यांग व्यक्ति सरकारी योजनाओं से वंचित हो सकते हैं. यह एक गंभीर मुद्दा है, जिस पर सरकार को तुरंत ध्यान देना चाहिए. पटना से गया जाने वाले रास्ते में मेरी मुलाकात एक शख़्स से हुई. हाइवे पर उनकी छोटी सी दुकान थी. साइड पर उनकी बैसाखी रखी थी. जब हमने उनसे पूछा की योजना का लाभ मिलता है या नहीं तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से जवाब दिया. उन्होंने कहा कि “ महीने के 400 रुपए मिलते हैं बाबू, घर में पत्नी है बच्चे हैं, दुकान से जितनी कमाई होती और 400 रुपया मिला भी दूं तो जीवन गुजारना कठिन है. सरकार 400 रुपया तो दे देती है लेकिन इन 400 में कुछ नहीं होता है कुछ भी नहीं. कई दिन तो ऐसा गुज़रता है जिस दिन घर पर रोटी भी नहीं बन पाती है. हम सरकार से ये चाहते हैं कि सरकार अनाज भी दे और पेंशन की राशि भी बढ़ाए.”

निष्कर्ष

बिहार में दिव्यांग नागरिकों को सरकार की ओर से जो मदद मिल रही है, वह उनकी जरूरतों के हिसाब से बेहद कम और अपर्याप्त है. जब उत्तर प्रदेश, दिल्ली और तमिलनाडु जैसे राज्य विकलांग पेंशन में अधिक सहायता दे सकते हैं, तो बिहार क्यों नहीं?दिव्यांगों को समाज का हिस्सा बनाने के लिए सिर्फ़ कानून बनाना काफ़ी नहीं है, बल्कि उनका सही ढंग से कार्यान्वयन भी जरूरी है.